सोमवार, अक्तूबर 11, 2010

किस पर विश्वास किया जाए..

                     कल सुबह खेल के मैदान से आने के बाद मैंने चाय का प्याला और न्यूज़ पेपर थामा और सोफे पर जा कर जम गया, आज हार जाने के कारण मन उतना प्रसन्न नहीं था, पर  दीवाली करीब है कहकर मम्मी ने साफ़-सफाई पर लगा दिया, मन में झल्लाहट तो थी ही उपर से किसी के गेट जोर-जोर से बजाने से और गुस्से में आ गाया, मुझे ही देखने जाना पड़ा की कौन है, मेन गेट से घर के बीच में आँगन है, कोई औरत थी, मांगने वाली थी दूर से देखकर अंदाजा लगाया, पास जाकर पूछने से अच्छा मैंने दूर से ही चिल्ला कर पूछा क्या है, कोई अगर भिखारी हो तो उसे एक कटोरी चावल जरुर देना पड़ता है, पर उसके हाथो में कोई कागज़ था देखकर समझ आ रहा था की कोई चंदा मांगने वाली है, वो जो बोल रही थी स्पष्ट रूप से सुनाई नहीं दे रहा था, मजबूरन मुझे और आगे जाना पड़ा, वो लगातार कुछ बोले जा रही थी, फिर आधे रास्ते में ही मुझे माजरा समझ आ गया, वो बच्चा बीमार है करके मांगने आई थी |

जब भी कोई गेट पर मांगने आता है मेरे सामने धार्मिक फिल्मो और टीवी के सीरिअल्स का वो दृश्य सामने आ जाता है, जिसमे भगवान अपने भक्तो की परीक्षा लेने भिक्षु बनकर किसी के द्वार पर जाते है, और अगर वहा से कुछ मिलता है तो उसका सब अच्छा-अच्छा होता है, और कुछ लोग नहीं देते तो उसका बुरा हो जाता है, ये सोचकर मै चेहरा देखकर जानने की कोशिश जरुर करता हूँ, और ज्यादातर कुछ ना कुछ दे जरुर देता हूँ |

सामने वाले घर के गेट पर नजर गयी तो देखा एक और औरत वैसा ही कोई कागज़ लिए दरवाजा खटखटा रही थी, बीच रास्ते में ही उसके कागज़ को देखा पारदर्शी पोलीथीन से पैक था, मैला जरुर था, वो बार-बार उस कागज को देख लेने का आग्रह कर रही थी, उसका चेहरा देखा तो काफी दुःख से भरा जरुर नजर आ रहा था, पर उसके मांगने के तरीके नए नहीं थे, सो मुझे उसके पोलीथीन और और दूसरी औरत को देखकर बनावटी लगा सब |

मैंने ज्यादा पास जाये बैगेर ही उससे नहीं का इशारा करते हुए कहा हम लोग नहीं देंगे जाओ, पर वो लगातार कहती जा रही थी, मोर लैका डॉक्टर गुप्ता के अस्पताल में भर्ती हे, फेफड़ा सुखा गे हे ,थोडा मदद कर दे बाबू (छत्तीसगढ़ी में), मैंने जयादा बहस ना करते हुए अपने कदम वापस मोड लिए |

शाम लाइब्रेरी के लिए निकला, लाइब्रेरी जाने के रास्ते में डॉक्टर गुप्ता का अस्पताल पड़ता है, अचानक सुबह का वाकया याद आ गया, मैंने देखने की कोशिश की की वो औरत यहाँ है तो नहीं, उसे नहीं पाकर मन में संतोष हुआ, फिर रात को once upon in time in mumbai फिल्म आ रही थी, देखा एक औरत सुलतान (अजय देवगन) से अपने बेटे के बारे में बताते हुए भीख मांगती है और सुलतान दुवाओ में याद रखना कहकर हर बार खूब पैसे देता है, मुझे फिर वो सुबह का वाकया नजरों के सामने लगा, बार-बार अपने निर्णय को तर्क के तराजू में तौल रहा था |

फिर मैंने पाया की मैं भी क्या करता कितने लोगो पर विश्वास करके चंदा दिया जाए ऐसे में तो आम आदमी अपना घर ही डूबा बैठेगा, गणेश, दुर्गा, होली, अनाथालय आदि लोगो के नाम पर चन्दा दे-दे कर आम आदमी इतना अविश्वासी हो गया है अगर भगवान भी उसके द्वार पर आकार कहे की मैं भगवान हूँ तो आदमी सोचेगा फिर चंदा लेने वाला आ गया है, आज आम आदमी इन लोगो द्वारा अपने ठगे जाने को लेकर इतना सजग है की हर सही-गलत आदमी ठग ही लगता है, समाज के कुछ लोगो ने हमारे विश्वास का इतना गलत इस्तेमाल किया है, सही आदमी जिसे वास्तव में चंदे या मदद की जरुरत है कुछ मिले ना मिले ठोकर और तिरस्कार जरुर मिलेगा |

शायद इस बार भी मेरे लिखना निरर्थक हो जायेगा, प्रश्न तो जरुर किया है मैंने पर इसका उत्तर या समाधान खोज पाना मेरे बस की बात नहीं है, खैर मैंने प्रश्न तो चिट्ठाजगत पर ला दिया है, अब यहाँ के बुद्धिजीवी कोई ना कोई समाधान जरुर खोज लेंगे ये आशा करता हूँ |

11 टिप्‍पणियां:

  1. इस युग में धोका देने वालों के कारण सही लोग हमेशा से अवसरों से वंचित रह जाते हैं, यहाँ भी वही बात है. मेरे विचार से खोजबीन करके अथवा विवेक के हिसाब से ही किसी की मदद का निर्णय लिया जा सकता है. बेहतरीन लेख लिखा है आपने.

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  2. सच में आज कल किसी को कुछ देने का मन नहीं करता... १00 झूठे लोगों में से सिर्फ २-३ ही असली जरूरतमंद होते हैं.... अब हम भी क्या करें, कैसे पहचाने.. विचारणीय विषय...
    मेरे ब्लॉग पर इस बार

    एक और आईडिया....

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  3. Some are trustworthy, but not all. So just help them as per your capacity.

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  4. क्या कर सकते हैं भाई, ऐसी समस्या एक बार तब आई थी जब दफ्तर के किसी काम के सिलसिले में दिल्ली जाना हुआ था..
    वैसे कुछ लोग सही भी रहते हैं, लेकिन उन्हें भला कैसे कोई पहचाने...लूटने वालों की भी तो संख्या कम नहीं....
    ट्रैफिक सिग्नल फिल्म देखने के बाद तो और भी कम विश्वास होता है इन सब चीज़ पे

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  5. क्या कर सकते हैं भाई, ऐसी समस्या एक बार तब आई थी जब दफ्तर के किसी काम के सिलसिले में दिल्ली जाना हुआ था..
    वैसे कुछ लोग सही भी रहते हैं, लेकिन उन्हें भला कैसे कोई पहचाने...लूटने वालों की भी तो संख्या कम नहीं....
    ट्रैफिक सिग्नल फिल्म देखने के बाद तो और भी कम विश्वास होता है इन सब चीज़ पे

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  6. अरे, छुपे रुस्तम निकले भाई.........

    बहुत बढिया लिखा है....

    एक बार फिर कहेगे......

    बढिया.

    उदार बने रहो....
    कईयों कि रोटी का सवाल है..

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  7. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  8. साकेत,
    देर से आया हूँ, और पढ़कर लगता है कि अपना ही नुकसान किया। बहुत अच्छा लिखा है, उससे भी अच्छा पूछा है लेकिन दिक्कत यही है कि इसका सर्वसम्मत समाधान उपलब्ध नहीं है। अपात्र को देना व्यर्थ है, कुपात्र को देना गलत है और सुपात्र को देना ही चाहिये। बेस्ट ऒप्शन आत्मा की आवाज ही है, कहीं अंदर से आवाज आये कि कुछ करना चाहिये तो कर दो, बस्स। हाँ, धन के अलावा भी दूसरों की मदद करने के तरीके हैं, उनमें धोखा खाने के चांस भी कम हैं उसमें।
    सार्थक लेखन, बधाई।

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  9. gr8 work dear...
    sach me aisi duvidha to hum sabhi ke samne aati hi hai... par i think help
    help karne me burai nhi hai... kam se kam wo paisa kisi garib ki roti ke hi to kaam aane wala hai... un logo ki bhi majburi hai ki aisa kaam kar rahe hai warna kisi ko dhoka dena kaun chahega.. :)

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  10. समाज के कुछ लोगो ने हमारे विश्वास का इतना गलत इस्तेमाल किया है, सही आदमी जिसे वास्तव में चंदे या मदद की जरुरत है कुछ मिले ना मिले ठोकर और तिरस्कार जरुर मिलेगा |
    जिन्दगी का बहुत बडा सच् है ये..........
    बहुत अच्छा लिख है

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मेरे ब्लॉग पर आ कर अपना बहुमूल्य समय देने का बहुत बहुत धन्यवाद ..