शनिवार, फ़रवरी 25, 2012

मरीचिका

 कुछ दूर और फिर तुम,
कुछ कदम और फिर तुम,
उफ़ ये नापाक मरीचिका,
जैसे सब कुछ लिखा हो,
चन्द कुछ घिसी-पीटी  लकीरों में,
तो क्यों न खुरच कर बदल दूँ इन्हें |

12 टिप्‍पणियां:

  1. yadi aap mere dwara sampadit kavy sangrah mein shamil hona chahte hain to sampark karen
    rasprabha@gmail.com

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  2. ♥*♥






    अब लकीरों को खुरच कर बदल ही दीजिए … बहुत ख़ूब !

    और श्रेष्ठ लिखिए साकेत शर्मा जी !

    हार्दिक शुभकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  3. चित्र को आधार रख कर बहुत खूब काल्पनिक शब्द चित्र खींचा है आपने, बधाई|

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  4. मरीचिका....
    अब तक काफी कम लोगों ने पढ़ी ये रचना
    और जिसने भी पढ़ी(मैं भी शामिल हूँ) मरीचिका के भ्रम से उबर गए

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  5. आज 11/06/2012 को आपकी यह पोस्ट (दीप्ति शर्मा जी की प्रस्तुति मे) http://nayi-purani-halchal.blogspot.com पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  6. बहुत खूब|||||
    बहुत ही बढ़िया....

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  7. साकेत जी सोच की बेहतरीन उड़न देखने को मिली आपकी सुन्दर पंक्तियों में
    ...
    कुछ दूर और फिर तुम,
    कुछ कदम और फिर तुम,
    उफ़ ये नापाक मरीचिका,
    जैसे सब कुछ लिखा हो,

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  8. कम शब्दों में खूबसूरत बात कह दी

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मेरे ब्लॉग पर आ कर अपना बहुमूल्य समय देने का बहुत बहुत धन्यवाद ..