गुरुवार, अगस्त 23, 2012

..मुत्थु...


             मैं यहाँ ३० सालों से काम कर रहा हूँ, जानता हूँ यहाँ सब साहब लोग सिर्फ अपना जेब भरने का जुगाड़ करते है | मैं उसकी बातें मन से नहीं सुन रहा था,बीच-बीच में हाँ हूँ या सही है जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर देता जिससे उसे लगे की मैं उसकी बातें सुन रहा हूँ |
               मुत्थु, नारायण का असली नाम नहीं था, बहुत कम लोग उसका असली नाम जानते होंगे, मुझे उसी ने बताया था जब वह पहली बार मुझे मिला था, मध्यम कद, भारी भरकम शरीर और काला रंग उसके नाम को सही जंचता था, एक पैर को लगभग घसीटते हुए धीरे-धीरे चलता था, जिससे उसकी एक पैर की चप्पल का निचला सिरा काफी घिस चुका था, वह अपनी उम्र ५७ बताता पर शरीर से ६७ की उम्र से कम का नहीं लगता, दफ्तर में था तो वह चपरासी था पर उससे बमुश्किल दिन भर में १-२ काम लिया जाता और सारा दिन वह अपनी स्टूल पर बैठे-बैठे काट देता |
            वह मेरे टेबल पर एक हाथ से कब्ज़ा जमाये बोले जा रहा था, फिर अचानक वह थोडा और पास आ गया और आवाज़ धीमी करके बोलने लगा, जैसे वह ख़ुफ़िया एजेंट है और कई जासूस उसकी बातें सुनने कान गडाए हैं, ये जो बड़े साहब है न उनके घर पर जो सोफा रखा है न वह दफ्तर का ही है, और कितने ही कुर्सी अपने घर पर ले जा चुके हैं, मैंने दिखावे के लिए विस्मय से कहा ”ऐसा क्या”, पर वह मेरे भाव समझ नहीं पाया और उल्टा उत्साहित हो गया और कभी आवाज़ धीमी तो कभी सामान्य आवाज़ में इधर-उधर की बातें बताता रहा और मैं बिना नजरें उठाये हाँ, हूँ करता रहा |
                  वैसे तो मैं दिन भर अपने काम में व्यस्त रहता पर मुझे अक्सर दफ्तर आने और जाने के वक़्त पकड़ ही लेता था, इसके अलावा अगर दिन में मैं कभी सुस्ताता दीखता तो वह तुरंत हाजिर हो जाता, उसकी कही बातों से लगता जैसे वह न्यूज़ चैनल से बातें रट कर आया है, वह चाहता की मैं भी अपनी कुछ राय दूँ ताकि बातचीत और रोचक बनाया जा सके, पर मैं उसकी बातों पर हाँ-हूँ करता रहता जिससे उसे लगे मैं उसकी बातों को सुनने का इच्छुक नहीं हूँ और वह जल्दी से दफा हो सके, कई बार उसके मुद्दे व तर्क इतने बकवास और स्तरहीन लगते की मैं सिर्फ तिलमिला कर रह जाता, पर कुछ बोलते नहीं बनता था,इसका कारण एक तो उसकी उम्र थी और दूसरी ये की मैं अक्सर कठोर शब्द बोलने से बचता था |
         आजकल कुछ दिनों से वह अपना बैठने का स्टूल ऐसी जगह सेट कर लिया था जहा से वह आसानी से मुझको देख सके जैसे वह किसी भी समय मुझे खाली छोड़ना नहीं चाहता था, दफ्तर ज्वाइन किये अब मुझे एक माह हो चुके थे, मैं काम और मुत्थु की बकवास बातें सुन कर पक चूका था, बीच-बीच में रिलेक्स होने के लिए दफ्तर से बाहर निकल जाता था जहाँ एक टी-स्टाल था, कुछ दिनों तक मुत्थु की आँखों में धुल झोकता रहा, सुबह दफ्तर देर से आना और देर तक काम करने के  कारण मुत्थु को अब मुझसे मिलने का समय नहीं मिलता था, अब लगा मुत्थु से अब छुटकारा मिल गया है, पर ये इतना आसन नहीं था, एक दिन देखा तो मुत्थु टी स्टाल पर पहले से ही मौजूद था, अब तो जैसे ही मैं टी स्टाल के लिए निकलता तो मुत्थु भी मेरे पीछे-पीछे पहुच जाता, एक-दो बार तो मैंने मुत्थु से चाय के लिए पूछ कर पिलाया पर अगली बार चाय स्टाल का मालिक खुद ही दो चाय भेजने लगा, चाय आर्डर करने से लेकर वापस दफ्तर पहुचने तक का समय अब मुझे भयावह लगने लगा, मुत्थु से पीछा न छूटता देख मैंने चाय स्टाल पर जाना छोड़ दिया, पर अब हालात और बिगड़ने लगे अब मुत्थु खुद दो चाय लेकर आने लगा, एक दो दिन तो मैंने उसे चाय वाले को देने के लिए पैसे दिए पर अगले दिन से मैंने उसे पैसे देना बंद कर दिए, पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ना था, चाय वाले ने ७ दिन का बिल ऊपर से थमा दिया |
        आज बारिश की वजह से दफ्तर में काम ढीला ही था, मैं भी जल्दी से काम निपटा कर घर लौटने के फिराक में था की सामने से मुत्थु आता दिखा, दफ्तर में सिर्फ उसके चलने से होने वाले आवाज़ से मैं समझ जाता की अब मुत्थु आने वाला है, दफ्तर में अन्य लोग इतने व्यस्त रहते की उनके चलने से ऐसा लगता जैसे सिर्फ परछाई इधर से उधर हुई है, और मुत्थु के आने से ऐसा लगता जैसे काली घटा धीरे-धीरे आसमान पर छा रही है, और रौशनी कम होती जा रही है, ऐसा इसलिए भी लगता क्योंकि जैसे-जैसे वह पास आता जाता धीरे-धीरे दरवाजे से आने वाली रौशनी भी उसी अनुपात में कम होती जाती, उसके लंगड़ा कर धीरे-धीरे चलने से ऐसा भी लगता जैसे वह सोचते हुए आ रहा क्या-क्या उसे कहना है |
 आते ही उसने पहले महंगाई के मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथ लिया, फिर क्रिकेट खिलाडियों के आचरण पर बातें करने लगा, मैं हमेशा की तरह सर गडाए अपने फाइलों में व्यस्त था, तभी दरवाजे पर आहट सुनकर मुत्थु और मैं दरवाजे की ओर देखने लगे, कुरिअर वाला लड़का था, उसने मुझे एक लिफाफा दिया और एक किताब दिया जिसमे मैं सिग्नेचर करने के लिए अपना नाम खोजने लगा, कुरिअर वाला लड़का मुत्थु की ओर देखने लगा, मुत्थु अभी चुप था और कुरिअर वाले के जाने का इंतजार कर रहा था, तभी कुरिअर वाले ने मजाकिया लहजे में मुत्थु से कहा “तेरी बीबी किसके साथ भाग गयी” मुत्थु बिना कुछ बोले हड़बड़ी में बाहर निकल गया, कुरिअर वाले ने मेरे चेहरे के मनोभाव पढ़ लिए थे, और बोलने लगा, और बोला साहब इसकी बात मत सुना करो पागल है, जब भी यह अपना भाषण शुरू करे सिर्फ इससे यह पूछ लिया करो “तेरी बीवी किसके साथ भाग गयी” तुरन्त रफूचक्कर हो जायेगा |मुझे कुरिअर वाले की बातें अविश्वसनीय लगी, मैं उसके जाने के बाद अपनी फाइल समेटने लगा और अपने केबिन के लाइट पंखे बंद कर निकल ही रहा था की मुत्थु ने मुझे फिर पकड़ लिया, मैं उससे पीछा छुड़ाने जल्दी-जल्दी गेट की ओर बढ़ने लगा पर मुत्थु भी कहा हार मानने वाला था मेरी बराबरी करने वह लगबग दौड़े जा रहा था, अब मै दफ्तर के बाहर निकल चुका था, मुत्थु अब भी मेरे पीछे चला आ रहा था और उसका न्यूज़ चैनल अभी भी चालू था, मैं उससे पीछा छुड़ाने के लिए कुछ भी करने को तैयार था, आखिर जो कुरिअर वाले ने मुझे कहने को कहा था मैंने कह दिया, उसके चलने के आवाज़ से मुझे पता चल गया की वह मुझसे पीछे छुट गया |
           दुसरे दिन मैं कल वाली घटना भूल चूका था, दोपहर तक तो कुछ पता नहीं चला, दोपहर तक तो मुझे पता नहीं चला, पर जब मुत्थु के स्टूल वाले जगह पर नजर गयी तब पता चला उसके स्टूल का जगह अब बदल गया है अब वह मेरे चेम्बर से नजर नहीं आता था, आज शाम को भी वह तंग करने नहीं आया तब विश्वास हुआ की एक सिरदर्द दूर हुआ |
             २-३ दिन बाद फिर कुरिअर वाला लड़का कुरिअर देने आया और ना चाहते हुए भी मैंने उससे मुत्थु के बारे में पूछ लिया, कुरिअर वाले लड़के ने मजाकिया लहजे में हंस-हंस कर बोलना शुरू किया, साहब आप नए हो आपको मालूम नहीं है पहले यह बहुत शराब पीता था ,सारी तनख्वाह सिर्फ पीने में उड़ा देता था, फिर एक दिन इसकी बीवी अपने बच्चों को लेकर इसको छोड़ कर कही चली गयी, इसने महीनो तक उसको ढूंढा पर वह कभी वापस नहीं आई, इसने अपना मानसिक संतुलन खो दिया और दिन रात नशे में रहता और पी कर अपने कमरे में ही पड़ा रहता, फिर एक दिन पता नहीं अचानक क्या हुआ हुआ इसको उसने शराब पीनी छोड़ दी और फिर से दफ्तर आना शुरू कर दिया, और ज्यादा बात करना शुरू कर दिया, अब करीब करीब १५ साल से ये ऐसा ही है, इसको भागने का सिर्फ एक ही तरीका है इससे पूछ लो “ तेरी बीवी किसके साथ भाग गयी ” वह तुरंत कट लेगा |
         मुत्थु के बारे में सुना तो कानों पर विश्वास नहीं हुआ, घर आने पर भी मैं उसके बारे में सोचता रहा, मुझे शहर में अपना पहला दिन याद आ गया, नयी नौकरी नया शहर, और सबसे पहले मुत्थु से मिला उसका मुझे दफ्तर तक ले कर जाना याद आया, उसकी होटल वाले को दी हिदयात याद आयी साहब को ऐसा खाना खिलाना वैसा खाना खिलाना |
         अगले दिन मुत्थु को स्टूल पर बैठा देख अपने पर शर्म आयी, उसका चेहरा वैसा ही था जैसे कुछ हुआ ही नहीं, बस वह मुझसे नजरे नहीं मिला रहा था और मै उससे, मैं अपनी कुर्सी पर बैठे फाइलों पर नजरें तो जरुर गडाया हुआ था पर सोच रहा था मेरा उस दिन ऐसा कहने के बाद उसने क्या किया होगा, हो सकता है वह बहुत दुखी हुआ हो और वो शराब दुकान गया हो और उसने शराब पी हो, मेरे सामने एक पागल व्यक्ति का चित्र आ गया जो लंगड़ा कर चलता है, बच्चे उसे चिढ़ा रहे हैं और वो लंगड़ा-लंगड़ा कर बच्चों को भागने की असफल कोशिश कर रहा है, आस पास के दूकान वाले सिर्फ एक बार नजर उठा कर दृश्य देख लेते है, अन्ततः वह दुखी होकर अपने घर की ओर वापस मुड जाता है, बच्चे उसे उसके घर के बाहर से ही आवाज़ लगा कर चिढाने की कोशिश करते हैं और वह बाहर के शोर को कम करने के लिए टीवी ऑन कर लेता है, बच्चे उसे ना चिढ़ता देख वापस अपने दुसरे खेलों में व्यस्त हो जाते है, उसका मन अकेलापन दूर करने के लिए संवाद चाहता पर कोई उसे सुनने को तैयार न होता, वह बड़ी समझदारी से दूसरों को अपने संवाद में उलझाने का प्रयत्न करता, पर अतिव्यस्त बुद्धिमान मनुष्य उसके बीवी के बारे में सवाल पूछते, उससे कोई जवाब देते ना बनता और वह चुप होकर अपनी अँधेरी खोली में छुप जाता |
       दफ्तर बंद होने का वक़्त हो चुका था एक-एक कर सभी बाहर निकल चुके थे मैंने भी अपने टेबल के सामान को लगभग बेहोशी की अवस्था में एक ओर समेटा और बाहर की ओर जाने लगा, मुत्थु लंगड़ाते हुए दफतर के अधखुले दरवाजे से अपने को गिरने से बचाने का प्रयास करता हुआ निकल रहा था, उसके दरवाजे से निकलते तक मै उसके पास पहुच चुका था, मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा, विस्मय और डर का भाव लिए उसने अपना सर घुमाया, तब मैंने कहा मुत्थु स्वामी चाय पीने चलोगे | 

अपने आस-पास देखते चलो क्या हो रहा है,जिंदगी जीना सीख जाओगे |     

..क्या-करूँ..    
           

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अचछा,
    छोटे छोटे से ये अनुभव ही जिंदगी मैं हमारी सोच को बेहतर बनाते है ..

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  2. बहुत अच्छा लिखा है आपने
    आस पास की घटना
    हमें और जानकारी देती है..
    अनुभव देती है.हमारी सोच को बेहतर बनाती है..

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  3. बहुत ही अच्छा लिखा है आपने...किसी दुसरे की मनः:स्थिति को समझना इतना आसान नहीं होता पर आपने अपने शब्दों से बखूबी व्यक्त कर दिया......

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  4. जीवन के लिए हर अनुभव महत्वपूर्ण होता है... बढ़िया प्रस्तुति

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  5. मुत्थु से मिलना अच्छा लगा। हृदयस्पर्शी कहानी!

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मेरे ब्लॉग पर आ कर अपना बहुमूल्य समय देने का बहुत बहुत धन्यवाद ..