मंगलवार, जून 19, 2012

उफ़ उनकी ये बेपरवाह नजरें..















ऐसा भी नहीं था की पहचान नहीं थी,
नजरें भी मिली थी, पर उन्होंने देखा ऐसे,
जैसे कोई किसी के दिए गुलदस्ते को एक बार देख, बस रख देता है,

फूलों के मुरझाने की भी वजहें होती हैं |

10 टिप्‍पणियां:

  1. वाह.............
    बेहद खूबसूरत बात.........

    अनु

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  2. ...बिलकुल सच..बहुत सुंदर रचना..

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  3. सुन्दर है भाई!!
    गुलज़ार साहब की एक त्रिवेणी याद आ गयी -

    "सामने आए मेरे देखा मुझे बात भी की
    मुस्कराए भी ,पुरानी किसी पहचान की खातिर

    कल का अखबार था ,बस देख लिया रख भी दिया"

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  4. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति । मेरे पोस्ट पर आपका हार्दिक अभिनंदन है। धन्यवाद ।

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  5. लाजवाब ... पर हो सकता है कुछ मजबूरियाँ रही हों ...

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मेरे ब्लॉग पर आ कर अपना बहुमूल्य समय देने का बहुत बहुत धन्यवाद ..