सोमवार, सितंबर 10, 2012

विस्की..



उनकी सूरत भी आँखों में ठीक से छप नहीं पायी थी,
कमबख्त होश दगा दे गया,


नजरे मिलाने से यूँ ही नहीं डरा करते थे |      

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत मस्त है..
    एक शेर मुझे भी याद आ गया...
    "किसी को देखते ही होश उड़ जाते है...
    इस दिल को थाम कर रखना ग़ालिब..
    वरना दिल इतना न धड़के की
    बाहर ही आ जाये..."
    :-)
    ....

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  2. नरेश यादव :-

    बहुत अच्छा लिखा है-

    "क्या होगा इस वृद्ध के मन में जो इसे इस उम्र में बारिस में इतना लम्बा सफ़र करने की प्रेरणा देता होगा "

    कभी कभी मेरे दिल में भी ये सवाल आता है ।

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मेरे ब्लॉग पर आ कर अपना बहुमूल्य समय देने का बहुत बहुत धन्यवाद ..