शनिवार, नवंबर 30, 2013

वो पुल..















वो पुल आज भी जहाँ का तहां खड़ा है,

किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति लिए,

जैसे पहले हुआ करता था,

उस पुल पर जाने से आज भी जी घबराता है,

तमाम मजबूरियां गिना कर मैं उसे अकेले पुल पर छोड़ आया था,

वह मुझे जाते देखती रही,

शायद पुकारती तो रुक जाता,

नदी के उफान से शोर भी था,

मैं आज भी सोचता हूँ,


उसने मुझे पुकारा था की नहीं..

2 टिप्‍पणियां:

  1. पुकारा होगा.......
    तभी तो याद आता है वो पुल...वो दिन...
    सुन्दर रचना...
    अनु

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  2. मैं यह सोचकर उसके दर से उठा था। …
    बढ़िया लिखा !

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मेरे ब्लॉग पर आ कर अपना बहुमूल्य समय देने का बहुत बहुत धन्यवाद ..