शुक्रवार, अप्रैल 06, 2012

तुम हो पास मेरे


















उफ़ ये रात का तूफान ,
किताबो से दबे सूखे पुराने पत्ते उडाकर ले गया ,
जाने आज रात और क्या-क्या निकाल बाहर करेगा |


शनिवार, फ़रवरी 25, 2012

मरीचिका

 कुछ दूर और फिर तुम,
कुछ कदम और फिर तुम,
उफ़ ये नापाक मरीचिका,
जैसे सब कुछ लिखा हो,
चन्द कुछ घिसी-पीटी  लकीरों में,
तो क्यों न खुरच कर बदल दूँ इन्हें |

रविवार, जनवरी 15, 2012

एक कप काफ़ी


जब तुम साथ थे तब वक्त साथ नही था,
अब वक्त साथ है तो तुम साथ नहीं हो,
तुम पर एक कप काफ़ी अभी भी उधार है |

तुम क्यों नहीं आते


रूठे उस वक्त तुम मुझसे कुछ इस तरह,
उस वक्त मुझसे रोका नहीं गया,
सोचा साहिल पर कभी तो पलट कर आएगी,
सुना है बहुत खुश है वह अपने नए शहर में,
दोष कुछ वक्त का भी था जरा थमा नहीं मेरे लिए,
सब कहते है वक्त पलट कर नहीं आता,पर तुम क्यों नहीं आते |

रविवार, जनवरी 01, 2012

रेतघड़ी



दिन बुरे नहीं थे जब पानी और सूरज घरो की छ्प्परें लाँघ जाते थे,
जब हवा भी बिन पूछे दरवाजा धेलकर अंदर आ जाती थी,
जब दिन की शुरूवात पंछियों के चहचाहट और रातें जुगनुओं की रौशनी से भरी होती थी,
जब सारा दिन यूँ ही दोस्तों के साथ और रातें हसीं ख्वाबो में काट दिया जाता था,
जब बारिश में खिड़कीयों के कांच पर उंगली से सन्देशे लिखे जाते थे,
जब हवाई जहाज की आवाज सुन छतों की ओर बेलगाम भागा करते थे,
जब कंचो,मीठी गोलियों, पतंगों का कुशल व्यापारी की तरह सौदा किया जाता था,
जब कब कहाँ आँख लग जाए पता नहीं चलता था,

दिन बुरे नहीं थे जब पानी और सूरज घरो की छ्प्परें लाँघ जाते थे,
काश कोई उल्टा सकता वक्त को रेतघड़ी की तरह |