सोमवार, अप्रैल 25, 2011

सांझ


दफ्तर से घर के रास्ते पर,

अक्सर मुलाकात हो जाया करती है,

कहती है जल्दी में हूँ,मिलती हूँ तुमसे,

जाने कितनी ही बार दिल चाहता है,


काश मुलाकात थोड़ी लम्बी हो जाए,

जाने क्या रिश्ता है मेरे और सांझ के,

साथ-साथ घर लौटने का |

मेरी तमन्ना


रोज सोचता हूँ अभी ज़िन्दा हूँ किन तमन्नाओं के लिए,
सोचते-सोचते अक्सर सो जाया करता हूँ,
खवाब में क्या देखता हूँ घर के सामने,
एक बड़ा सा पीपल  का पेड़ है,
और अपने को दरवाजे पर खड़ा,
चोटियों को ताकता पता हूँ,
और ख्वाब टूटने पर एक नन्हा पौधा पाता हूँ
जो तेज हवाओं के चलने से खिलखिला रहा है |


शनिवार, दिसंबर 04, 2010

क्या कहूँ..

बहुत दिनों से दुनियादारी में व्यस्त रहा तब लगता था कब जान छूटे तो जा कर ब्लोगिंग में शरण पाऊं, दूर रहने पर अजीब से उदासी छा गयी थी, जब वापसी हुई यहाँ तो २-३ दिन की हालत सही थी फिर मन उदास होने लगा, ब्लॉग लिखने का मन बना तो पहले अपना ही ब्लॉग पढ़ लिया और लगा की शर्म के मारे डूब मरें, जिन पोस्ट को काफी एक्साइटमेंट के साथ लिखा था जिन पर लोगो ने बहुत सुन्दर, बहुत बढ़िया, और तरह-तरह की टिपणियां कर रखी थी, बहुत अजीब प्रतीत हो रहा था, लगा की झट अपना नाम बदल दें और फोटो हटा दें थोड़ी देर गम के अँधेरे में पड़े रहें, थोडा उससे भी बोर हुए तो तस्सली देने को मन हुआ, वैसे भी अपने को कौन पढता है, और चलो कम से कम हिंदी के प्रचार में योगदान तो दिया, पर लगा इतने से भी काम नहीं चलेगा थोडा और सोचना होगा तो सोचा चलो अपने प्रोफाइल में ये लिख दिया जाए की मै कोई लेखक या कवि नहीं बस तन्हाई को दूर करने के लिए बातें बाँट लेता हूँ, निराश तो था ही मै, पर देखा किसी ब्लॉग पर लिखा था “जो तुम में है, वह संसार में और भी है” पहले पढ़ा तो बकवास लगा फिर और ब्लोग्स देखते जा रहा रहा था चिट्ठाजगत पर थोड़ी देर में लगा की बात सही है (ही ही ही )

बहुत अच्छी और बहुत बेकार में बहुत कम ही अंतर होता है,
पता नहीं मै नहीं समझ पाता या लोग मुझे नहीं समझ पाते |

वैसे भी आशावादी लोगो का जमाना है तो मै क्यों निराश होने लगा, हम रोज मनुष्य को मरते कटते देखते है फिर भी ऐसा लगता है ऐसा हमारे साथ नहीं होगा, चाहे कोई मर जाए कितना भी करीबी क्यों ना हो खाना-सोना के बारे में सोचना ही पड़ता है | सोचते-सोचते लगा चलो एक पोस्ट की संख्या ही बढ़ा दी जाए, ये सोचना बहुत बुरी चीज है, कभी रात के ३ बजे ये क्रिया होने लगती है तो कभी गुसलखाने में, कई लोग घर के अंदर सोचते है तो कोई सोचने के लिए बाहर भी जाता है, आप अच्छे से ध्यान देंगे तो ऐसे लोग भी मिल जायेंगे जो ना अंदर सोचते है ना बाहर, मतलब घर के चौखट में बैठकर बकायदा सोचने वाली मुद्रा लिए, जैसे कोई रामदेव बाबा का बताया आसन हो, और ट्रेन में अगर भूले भटके पहूँच गए तो लगेगा सोचने का मौसम आ गया है, सोचने वाले लोग सोच भी कितना लेते है, कभी दीपिका के साथ अन्टार्टिका जाने की सोच लेते है, तो कभी अभी-ऐश के बीच आ जाते है, तो कभी बेचारे अमिताब के साथ ही न्यूज़ीलैण्ड पंहुच जाते है, टेलिविज़न पर एक जनाब “खेले हम जी जान से” फिल्म के स्टाफ के साथ सवाल-जवाब कर रहे थे, उन्होंने पूछा की आप को १३ की उम्र में पंहुचा दिया जाए तो आप क्या करेंगे, किसी ने कहा चेस खेलेंगे किसी ने कहा पढाई करेंगे, एक जनाब काफी गंभीर दिखे उन्होंने कहा सोचेंगे, अब उनसे और पूछा गया की क्या सोचेंगे, ये तो सोचने की हद ही हो गयी अभी कैसे सोचे की तब क्या सोचेंगे, कुछ भी हो लेकिन सोचने की ताकत को तो मानना पड़ेगा, कभी आदमी को बुलंदियों पर पंहुचा देती है कभी पागल बना देती है, वैसे मै तो बचपन से ही सोचते आ रहा हूँ, जब मेरे साथी सोच नहीं सकते थे की सोचना क्या होता है, खुशी होती थी की मै कब से सोचता चला आ रहा हूँ करके, पर एक दिन मोबाइल पर sms पढ़ कर वह भी जाती रहा, वह कुछ इस प्रकार था क्या आप जानते हैं कौन है जिसने जन्म से पहले ही सोचना शुरू कर दिया था?? जन्म से पहले शब्द सुनने पर बस एक ही बात जेहन में आयी अभिमन्यु, पर ऐसा तो वर्णन नहीं था की वह सोचता भी था, चलो देखते है कौन था कह कर जब स्क्रीन स्क्रोल किया तो लिखा था द ग्रेट रजनीकांत | यह भी सोचना बड़ा रोचक होगा जब रजनीकांत ने ऐसे मेसेज देखे होंगे तब क्या सोचा होगा, अब अतिशयोक्ति वर्ग के फिल्मो पर क्या असर पड़ेगा यह भी एक सोचने का विषय ही है |खैर अब लगता है सोच-सोच कर और लोगो को सोचवा-सोचवा कर हमने काफी अपनी और आपकी बिजली बर्बाद कर ली |अब एक आखिरी जुल्म मुझे आपके ऊपर कर लेने दीजिए |

आज सुबह आँख खुलते ही आँगन पर देखा था तुझको,
नहाने के बाद भी आँखे मलती खड़ी थी तुम,
शाम को देखा तो तितलियाँ ढूंढ रही थी तुझको,
किसी ने तोडा होगा गुलाब का वह नया फूल,
आज वेलेंटाइन डे हैं ना |

एक और जुल्म मेरी खातिर सह लीजिए ना प्लीज..

सुबह देखा तो मेरा रुमाल नदारद था,
शायद कल शाम की बारिश उडा ले गयी होगी,
अभी यादों की महल फीकी नहीं पड़ी थी उसमे |

बस ये आखिरी..

आईने को भी किसी चेहरे को देखने का मन होता होगा,
उसे भी किसी सूरत से प्यार होता होगा,
आईने के टूटने का कोई और कारण निकल लेते है लोग,
दरअसल वो कम्बक्त भी किसी का मारा होता है,
जो टूट कर कम से कम हमदर्दी तो पा लेता है |

पाठकों से अनुरोध है की क्या-कहूँ जैसे कमेन्ट ना किया करें समझ नहीं आता हमको ये कमेन्ट, इससे पता ही नहीं चलता की बहुत अच्छा लिखा है इसलिए क्या-कहूँ कह रहे है या उनको हमारी रचना कूड़े का ढेर लगी जिसके बदबू से नाक के भार क्या-कहूँ कह रहें है |

मंगलवार, नवंबर 30, 2010

जब गांधीजी ने मार खिलवा ही दिया था..

ब्लॉग पर पिछले पोस्ट को लिखे काफी समय गुजर चुका है,वैसे तो जिस दिन पिछला ब्लॉग पोस्ट किया था उस दिन से ही इस पोस्ट की प्लानिंग हो गयी थी, पर समय ऐसा रहा की कुछ लिख नहीं पाया, त्यौहार फिर इंटरव्यू ,सब निपटा के फिर अभी अपने पुराने सीट पर बैठा हूँ |

बात उस समय की है जब मै क्लास ७ में पढता था, स्कूल के सामने बहुत बड़ा मैदान था जहाँ हम सब लंच की छुट्टी में खेला करते,और उस मैदान के बगल में जिसका घर था उसके मालिक का और हमारे स्कूल का विवाद था, उस घर के पिछवाड़े में एक और खाली मैदान था जो हमरे स्कूल के भवन से सटा हुआ था दोनों पक्ष का कहना था की ये जगह उनकी है, और सब बच्चे इस विवाद से बेपरवाह उस मैदान में भी खेला करते और प्राचार्य महोदय रोज सुबह प्रार्थना के वक्त अपने भाषण में हमें वहां ना खेलने को कहते |

शनिवार का दिन था, शनिवार को सहायक वाचन की दो क्लास लगती थी जिसमे इस साल गाँधी जी के बारे में पढाया जाना था, ठण्ड का मौसम था बाहर खेल भी चल रहा था मैंने खेलों में भाग नहीं लिया था और जिन-जिन लोगों ने खेलों में भाग नहीं लिया था वो सब क्लास में बैठे थे,करीब ८ -१० छात्र रहे होंगे और करीब ३-४ छात्रायें रही होंगी, बहुत से छात्र बाहर थे इसलिए शिक्षक कोई नयी चीज ना पढाते हुए सबको अपने किताब पढ़ने की हिदायत दे राखी थी और खुद शिक्षक अपने रजिस्टर में कुछ हिसाब किताब करने में लगे थे |

मैंने आस पास नजरे दौडाई सामने वाले बेंच के दो लडके ज़मीन पर चाक से बैठे-बैठे ही फुटबाल खेल रहे थे, उनके जूतों की टकराने की आवाज़ और दबी आवाज़ में हँसने की आवाज़ कभी तेज हो जाती तो मास्टरजी के डर से वो थोड़ी देर खेल रोक देते और फिर एक युद्ध की तरह एक दूसरे पर विजय पाने की कोशिश करते, उनके युद्ध से चाक के कई टुकड़े हो चुके थे और हर टुकड़े को लेकर एक नया खेल शुरू हो जाता,और लोगो को देखा तो वो चने की लड़ाई में व्यस्त थे,मानो कक्षा उनके लिए युद्धभूमि बन गयी हो, बेंच में छुप कर अगले पर चने रूपी बम की बारिश कर रहे थे, शोर बढ़ता जा रहा था, अब मास्टरजी के काम में खलल पढ़ी सजा तो मिलेगी ही, अब सभी सैनिक ज़मीन पर घुटने टेके हुए थे, अब सन्नाटे में बाहर खेलो की आवाजे स्पस्ट सुनाई देने लगी, मैंने आस पास के लडको को देखा तो वे मास्टरजी के सन्नाटे में सेंध लगाने की कोशिश में दिखे, सैनिको का हाल देख कर मैंने किताब का सन्नाटा तोडना ज्यादा फायदेमंद समझा, मैंने अपने आँखे किताब पर गडा दी, किताब गांधीजी के बचपन से शुरू हुई, मुझे गांधीजी के साधारण श्रेणी के विधार्थी होने पर आश्चर्य लगा और थोडा अपने नम्बरों पर गर्व भी, फिर गाँधी जी के बारे में पढ़ा उन्हें बचपन में बातें करना पसंद नहीं था, मुझे भी, अब मैंने गाँधी और अपनी तुलना करना चालू कर दिया, और इसमें मुझे बहुत आनंद आने लगा, गाँधी जी के बचपन की बातें उनका विवाह उनकी हाईस्कूल की पढाई, उनके सत्य के अनुप्रयोग सब रोचक लगने लगा, मैं किताब में इतना खो गया की आस पास की कोई सुध नहीं रही, लंच की बेल बजी तो मेरा ध्यान टुटा, मैंने किताब बंद की और गांधीजी के सत्य के प्रयोग के बारे में सोचने लगा, गाँधी जी के चोरी और प्रायश्चित की बात सोच कर मेरा मन और भी निर्मल होता गया |

जाड़े के दिन थे अंदर सर्दी लग रही सो बाहर निकला, बाहर कोई गेंद से खेल रहा था, कोई किसी से रेस लगा रहा था, सुनहरी धुप थी, धुप में कोमलता का अहसास हो रहा था, गांधीजी को बचपन से ही टहलने की आदत थी सोच कर मैंने भी विवादित मैदान में टहलना शुरू किया, गांधीजी की बातें मन में घुमड़ रही थी, दूसरों की क्रियाकलापों का अवलोकन करते हुए ऐसे मौसम में बहुत अच्छा अहसास हो रहा था, टहलते हुए जब मैं विवादित मैदान के दूसरे पक्ष के घर के पास पंहुचा तो देखा उनके घर पर जाम के पेड़ पर बहुत से फल लगे हुए थे, कुछ बच्चे फल के लालच में उन पर पत्थरों से निशाना साध रहे थे, उनकी निशानेबाजी मुझे रोचक लग रही थी सो मेरे टहलने की गति यहा पर कम होती गयी, हालांकि मुझे फलों का कोई लालच नहीं था पर मेरे मन को पत्थरों का पेड़ के पत्तों से टकराना और फल सिर्फ हिल के रह जाना फिर बच्चों का पत्थर लाना फिर से कोशिश करना सुखद लग रहा था | तभी घर से एक औरत निकलती है और बच्चो को पकड़ने का असफल प्रयास करती है, मै पुनः अपने गति पर आ जाता हूँ और कहीं और नया देखने का प्रयास करता हूँ, और औरत के बच्चों को डांटने की आवाज़ कान में आती रहती है पर मै इससे बेपरवाह अपनी धुन में टहलता हुआ आगे बढ़ता हूँ और मेरे ध्यान से औरत वाली बात उतर जाती है और मै टहलते हुए उसके घर के सामने से गुजर रहा था तभी मुझे जमीन पर एक फल गिरा हुआ दिखा, पहले तो बिना कुछ सोचे मैं आगे बढ़ने लगा पर गांधी वाली निर्मलता की ठंडकता लगते ही बिना ज्यादा इस पर विचार किये मैंने उसे उस औरत को वापस करने की निश्चय किया, फल उसके घर के सामने की पड़ा हुआ था द्रुतगति से उस फल तक पंहुचा और झुक कर फल को उठाया तो कुछ शोर सुनाई दिया ,देखा तब सही वस्तुस्थिति का बोध हुआ की वो फल सभी बच्चो के नजर में था सभी उसकी ताक में थे पर औरत के मैदान में होने के कारण कोई वहां तक पहुच पाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था, बच्चे फल हाथ से जाने से नाखुश थे की हमारी मेहनत और फल किसी और को, सो उन्होंने चिल्ला कर औरत को बताना चाहा और मै फल वाले जगह से सही तरीके से फल हाथ में ले कर खड़ा भी न हो पाया था की वह औरत द्रुतगति से मेरे सामने पहुच गयी थी, उसने गुस्से से मेरा हाथ मरोड़ा डर से और उसकी ताकत से मेरे हाथ से फल तो छुट गया और मैंने बचने हेतु सफाई देना चाहा की मैं ये फल आपको देना चाहता था लेकिन बच्चो की शोर से और उस महिला की डांट से जो भी मेरे मुख से निकला वो शायद ही किसी के कर्ण पटलो को स्पर्श कर पाया हो |

अब महिला ने मेरे हाथों को मरोड़े हुए मेरे न चाहते हुए भी शाला परिसर में प्रवेश किया, मै जैसे अपने आप घसीटा चला जा रहा था, उस गिरे हुए फल क्या क्या हुआ पता नहीं पर ऐसी विकट परिस्थिति की मैंने कभी कल्पना नहीं की थी, कुछ बच्चे उत्सुकता वश पीछे पीछे चले आ रहे थे हाँ पर उस महिला से पर्याप्त दुरी बनाते हुए, महिला बहुत गुस्से में थी उसने मुझे प्राचार्य के कमरे में ले जा कर ही मुक्त किया, और प्राचार्य से भी ऊँची आवाज़ में शिकायत करने लगी, उनके बीच क्या क्या बात होने लगी ये तो याद नहीं पर गलती स्कूल वालो की थी इसलिए प्राचार्य महोदय उनको आश्वासन देने में लगे थे, महिला जब थोड़ी ठंडी होने लगी तब प्राचार्य जी ने मुझे बाहर इंतजार करने को कहा और महिला को बैठने को कहा, मैंने कोई गलती नहीं की थी तब भी मेरा चेहरा अपराधीयों की तरह लटक गया था, मै जहाँ घंटी लटकी होती है वहां बेंच पर बैठ गया इस पर चपरासी के सिवा मैंने उसी को बैठा देखा है जिसे खेलते हुए कोई चोट लग जाती थी , चपरासी मरहम पट्टी के लिए बच्चो को इसी बेंच पर बिठाता था |

अभी भी बच्चो का झुण्ड दुरी बना कर मुझे उत्सुकता वश देखे जा रहा था, मैंने झुण्ड में कोई चेहरा पहचाने की कोशिश की तो सुनील नजर आया, जो की नम्बरों में मुझसे पीछे रहता था पर जब भी मै स्कूल नहीं जाता था उसी की कॉपी ले कर आता था, सुनील के साथ ही एक और विक्की जिसे मार खाने का काफी अनुभव था मेरे करीब आया, मैंने पहले न तो कभी ऐसी स्थिति देखी थी न सुनी थी पर विक्की ने बताया की परसों भी एक लड़के को वो महिला पकड़ लायी थी उस समय पटेल सर के पास उसने शिकायत की थी और पटेल सर ने उस बच्चे को खूब मारा और उसके घर वालों को बुलवाया भी, मेरी तो मार के नाम से ही घिग्घी बंध गयी, पहले अभी की तरह बच्चों को मारने पर इतना बवाल नहीं उठता था, मैंने कभी सजा का सामना किया नहीं था, विक्की आगे बताने लगा प्राचार्य कभी किसी बच्चे को मारते नहीं पर वो दूसरे सर को सजा देने का काम सौप देते हैं, शायद पटेल सर को ही दे दे, पटेल सर के मार के नाम से मेरे पैर ठन्डे पड़ गए, दिल जोरो से धड़कने लगा और घर में जो बेज्जती उसका डर अलग |

अब लंच खत्म होने की पहली बेल बज चुकी थी और सारे बच्चे जो झुण्ड लगाये खड़े थे अब जा चुके थे अब भी सुनील मेरे पास खड़ा था और दूसरी बेल बजते ही वो भी चला गया, और अब ऑफिस के गलियारे में सन्नाटा छा गया, कुछ-कुछ सर लोगो की पढाने की आवाज़ आने लगी, इस समय मैं पहले कभी क्लास से बाहर नहीं था, अब वो महिला भी संतुष्ट भाव चेहरे में लिए चली गयी अब मेरी पेशी थी, एक बार फिर पैरों में बहुत ठण्ड का अहसास हुआ और मैंने अपनी आखें बंद करके सोचा की कैसे प्राचार्य महोदय को समझाया जाए की मैंने पत्थर नहीं मारा था, मेरे मन में तरह तरह के सवाल आने लगे की अगर सीधे पटेल सर को मारने को कह दे तो और पटेल सर कुछ सुनने को ही इंकार कर दे तो, अब मैंने फिर डर के मारे आँखे बंद किया तो महात्मा गाँधी के शब्द मेरे कानो में गूंजने लगे “डर मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन होता है” जब मैंने कोई गलती नहीं की है तो डरना क्या ,अब मैंने डर को अलविदा कह दिया और क्या कहना है वह सोचने लगा |

सत्य के प्रयोग के उधेड़बुन में पता नहीं चला कब एक के बाद एक तीन विषयों की क्लास निकल गयी और छुट्टी की घंटी बज गयी और सुनील और विक्की को अपनी आँखों के सामने पाया, दोनों मेरी किस्मत पर अचम्भा करते हुए कह रहे थे तू बच गया अब चल घर,कल सन्डे है और सोमवार तक सब भूल जायेंगे,मै इससे पहले की कुछ समझ पाता मेरा बैग किसी ने मेरी पीठ पर चढा दिया और कुछ न करते करते हुए भी मैदान तक पहुच गया, अब लगा जैसे सिर की नसों में जैसे दिल उतर गया हो ,एक ओर बिना सच-झुट बोले बिना मार खाए साफ़ बच निकलने का मौका था तो दूसरी ओर प्राचार्य की आज्ञा का पालन कर मार खाया जा सकने का विकल्प था, मैंने यह बात दोस्तों से पूछनी की सोची तो कह नहीं पाया और मेरे बुद्धूपन पर मजाक उड़ने का भी भय था, स्कूल के गेट तक पहुचते-पहुचते मेरा निर्णय हो चुका था मैं रुक कर वापस मुड़ने को हुआ तो मित्रों की सवाल भरी नजर मेरे चेहरे पर पड़ी और मैंने झट कहा शायद किताब छुट गयी ले के आता हूँ और वापस स्कूल की ओर मैदान में दौड लगा दी, और जा कर प्राचार्य से सब कुछ कह दिया, उसके बाद प्राचार्य ने मुझसे क्या कह कर जाने को कहा ये शायद डर के कारण याद नहीं रहा मुझे पर शायद खुश ही हुए थे वो ,मैंने वापस आ कर ये बात घर में भी बताई पर शायद कोई समझ न सका, मित्रों को बताने की बात तो बहुत दूर थी बस मेरे मानस पटल पर ये बात किसी फिल्म की तरह आज भी अंकित है |

आज भी यह घटना मेरे लिए बहुत से जगहों पर प्रेरणा स्त्रोत की तरह है | इस घटना को लिखने के दौरान एक बार फिर से “सत्य का प्रयोग” पढ़ डाला | वैसे तो सत्य की महत्ता का अहसास आगे और भी हुआ पर पोस्ट ज्यादा लंबा खिचता जा रहा है, फिर कभी आपके सामने लाऊंगा उसे |

२४ नवम्बर २०१० को हमारे विद्यालय के शिक्षक श्री एस.आर.साहू का सड़क दुर्घटना में निधन हो गया, साहू सर हमें फिजिक्स और मैथ्स पढाया करते थे, उनके मार्गदर्शन ने अनेक छात्रों का भविष्य उज्वल किया है आईये हम उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें |
                       सजल नेत्रों और भारी मन से विनम्र श्रद्धांजलि !

गुरुवार, अक्टूबर 14, 2010

जाने क्यों बदल गया मैं..

“जब तक व्यक्ति को ये महसूस होता है की शायद उसके पिता सही थे तब उसके साथ उसका पिता नहीं पुत्र साथ होता है”        -चार्ल्स वोर्ड्सवोर्थ

दूर कहीं से आवाज़ आ रही है, शायद गणेश विसर्जन वाले हैं ,प्रभु और अंजली शायद गाँव में असहजता झेल के इतने थक गए हैं की बिस्तर पर लेटते ही उन्हें नींद आ गयी, आज ना जाने कितने सालों बाद ऐसी नौबत आई है की सोना चाह कर भी नहीं सो पा रहा हूँ, काफी देर सोने की कोशिश के बाद गुस्से से उठ कर डब्बे जैसे कमरे से निकलता हूँ |

मैं अपनी पत्नी और बच्चो को गाँव लाकर ये दिखाना चाहता था मैंने कैसे दलदल में रह कर अपनी जिंदगी बनायीं है, शहर और अपनी महानता साबित करने के लिए छुट्टी मल्टीनेशनल कंपनी से ली थी |

कमरे से बाहर निकलते ही सामने तुलसी का पौधा था, जिसे माँ रोज सुबह पानी पिलाती थी, और माँ के जाने के बाद पिताजी ये जिम्मेदारी निभाते थे ,माँ के बारे में इसके अलावा बस यही याद है की हमेशा पिताजी और मुझे जबरदस्ती खूब सा खाना परोस देती थी, तुलसी के तीनों और कमरे बने हुए थे,एक ओर गायों के रहने के लिए, एक ओर पिताजी और मेरे रहने के लिए, एक ओर बने कमरे में पिताजी जाने क्या हिसाब किताब किया करते थे ,उस कमरे में मै काफी कम ही गया था, पिताजी उस कमरे का ताला हमेशा काम करने के बाद बंद कर देते थे, बचपन में मुझे लगता की उसके अंदर बहुत कीमती सामान रखा होता होगा पर पिताजी के गुजरने के बाद देखा था कुछ पुराने बक्से थे मेरी कुछ पुरानी किताबे थी |

कमरे के बाहर एक आइना था जो की एकमात्र था,इसी आयने के सामने मैं बचपन में अलिफ़ लैला के पात्रों की नकल करता था, अब तो आईने में काले-काले दाग हो गए हैं इसमें अपना शक्ल देखने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है, कमरे की चाबी इसके बाहर ही लटकी हुई मिली, अंदर गया तो संदुक नजर आई थोडा धुल हटा के देखा तो हारमोनियम था, संतु बताया करता जब मालिक की शादी नहीं हुई थी तो कभी बजाया करते थे, पिताजी से पूछने पर हमेशा डांट दिया करते, उसके बगल में लोहे का बना बक्सा रखा हुआ था, शायद पिताजी रुपये इसमें रखा करते थे, मैंने धुल अपने ऊपर गिरने से बचाते हुए उसे खोला तो देखा एक ओर लक्ष्मी माता को फोटो लगा हुआ था, जिसका एक कोना गायब था लक्ष्मी माता के हाथ से सोने के सिक्के बरस रहे थे शायद पिताजी को लगता रहा होगा एकाध सिक्का पेटी में कभी गिर जायेगी ,संदूक के अंदर भी किताबो के सिवा कुछ नहीं था,एक किताब खोला तो उस पर रोशनलाल नाम लिखा था ,पिताजी के पिताजी की किताब थी,इसे संदूक के अंदर रखने का क्या फायदा, मूल्य ४ पैसे लिखा हुआ था,कुछ पढ़ना चाहा तो देखा शब्द ऐसे लिखे थे जैसे हाँथ से लिखे गए हो, लिखावट देख के पढ़ने का मन नहीं किया |

बचपन में किताब पढ़ने का बहुत शौख था मुझे पिताजी खुश होकर अक्सर किताबे ही लाया करते थे मेरे लिए ,मेरे अन्य सहपाठियों के पिताजी खुश होने पर मिठाई ले कर आते थे ,मै किताब देखकर खुश होता पर सोचने की कोशिश करता मिठाई क्यों नहीं ,फिर पिताजी को किताब पढ़ कर सुनाता और पिताजी सुनते-सुनते ही सो जाते शायद उन किताबो की कहानी बचकाना रहती होगी या शायद पिताजी बहुत थके रहते होंगे ,फिर मैं भी पिताजी की गोद में सो जाता ,पर सुबह उठने पर अपने को बिस्तर पर पाता ,पिताजी के खेत जाने के बाद नौकर संतु मेरी देखरेख करता ,देखरेख क्या मेरे साथ बच्चा बन कर खेलता ,पिताजी के शाम के आने के बाद भी बहुत बार वह हमारे सांथ ही बैठा रह जाता ,और जब मैं किताब पढ़ने लगता तो सबसे पहले वही सोता था ,संतु हमारे घर का ऐसा नौकर थे जो हर काम करता था ,साफ़-सफाई,खाना,दीवारों पर चुना पोतना,बाज़ार जाना, संतु ही मुझे स्कूल में भर्ती कराया,मास्टरजी से मिलने भी वही जाता, और शाम को पिताजी की रिपोर्ट करता |

अब मेरी किताबो की मोटाई बढ़ने लगी थी, अब संतु और पिताजी की बातें समझ आने लगी थी,पहले मैं संतु और पिताजी को बहुत ज्ञानी समझता था पर अब मास्टरजी सबसे ज्ञानी लगते थे,और किताबो का लेवल बढ़ने पर मैंने जाना मास्टरजी को कुछ नहीं पता है | फिर मैंने दुनिया के बारे में पढ़ा तब लगा विज्ञान भी अधूरा है,अब मुझे पढ़ने पास के शहर में भेजा गया | वह शहर ना होकर गाँव ही था,बस कुछ पक्के मकान थे कुछ पक्की सड़के थी और गरीबी हमारे गाँव से ज्यादा थी |

आखिर ३ सालो के अथक प्रयास के बाद मै ग्रेजुअट बन कर अपने घर पहुंचा, पिताजी और संतु मेरी सफलता से बहुत खुश थे ,लगा की जन्नत में आ गया हूँ, रोज पिताजी को अपने काम पर जाते देखता और शाम को आते देखता, पहले की तरह जिंदगी हो गयी सोच कर बहुत अच्छा लग रहा था, मैंने अपने पुराने मित्रों की ओर रुख किया तो पाया की सबकी शादी हो चुकी थी ,सभी अपने खेतों को कीडों से बचाने के लिए चिंतित थे, मैंने वापस घर की ओर रुख किया तो सारी किताबे मैं पढ़ चुका था, मेरी बाते समझने को कोई बचा नहीं था |

सो-सो कर थक जाता, लेटे–लेटे संतु को खाना बनाते हुए देखता, सुबह पिताजी को हड़बड़ी में काम पर जाते देखता, शाम को पिताजी घर आते, खाना खाते और सो जाते, मेरी बाते समझने वाला कोई नहीं था | कभी कभी पिताजी और संतु पर दया आती, कभी-कभी उनके निम्न जीवन स्तर और निम्न बुद्धि पर क्रोध आता | संतु और पिताजी की नजरे अब मुझे खा जाने वाली लगती, तंग आकार मैं घर से बाहर निकलता तो बाहर वाले मुझे ऐसे देखते जैसे मैं कोई उनसे अलग आदमी हूँ, एकांत की तलाश में निकलता तो लोगो के देखने से ऐसा लगता मानो वो शक कर रहे हो की मैं आत्महत्या तो नहीं करने जा रहा हूँ |

अब हर वो आदमी जो काम कर रहा होता अपना दुश्मन लगता और अब मैंने इस गाँव से मुंह छुपाने का मन बनाया, कई दिनों के बहस के बाद अंततः मैं गाँव छोड़ कर अकेले शहर की ओर निकला पड़ा, और एक-एक करके बड़े-बड़े शहरों की ओर कदम बढाता गया, और जब पीछे मुड कर देखा तो मैं एक सफल व्यक्ति के तौर पर जाना जाने लगा, शायद इसका श्रेय मेरी उपेक्षा को भी जाता है जिसने मुझे जिंदगी के उस कटु सत्य का अनुभव कराया जो किसी किताब से संभव नहीं हो पाता, ये दुनिया बड़ी अजीब है 100kg अनाज को बोरा जो उठा सकता है वो खरीद नहीं सकता और जो खरीद सकता है वो उठा नहीं सकता |


उजाला अगर पर्याप्त ना हो तो परछाई बना कर अँधेरा भी पैदा कर सकता है, अब फिर उपेक्षा का दौर शुरू होने को था पर इस बार व्यक्ति बदल गए थे, दूसरों से उपेक्षा तो आदमी सहन कर सकता है पर अपनो से उपेक्षा आदमी को कमजोर कर देती है, और पिताजी की ये उपेक्षा मेरी पत्नी के आने और मेरे आगे बढते जाने के साथ बढती गयी, जिन को सहारा बनना था वो अब दीमक की तरह आधार कमजोर करने में लगे थे ,जिस पसीने ने मुझे यहाँ तक पहुँचाया वो पसीना अब बदबूदार लगने लगा, पिताजी की चिंता अब बंधन लगने लगी, हर बात अब उपदेश लगने लगी |

अब मै और मेरी पत्नी खुलकर कमियों की निंदा करने लगे, शर्म अब मिटने लगी, संतु तो ये सब सह ना सका और अपने गाँव वापस चला गया, और शायद यही एक कारण है की वो अब तक जिंदा बच पाया |

जिधर देखा उधर पर्वत नजर आया और हर शिखर की चाह दिल में लिए बढ़ता चला गया, हर शिखर पर पहुचने पर एक और शिखर नजर आया |पहले पिताजी की सायकल बाहर हुई फिर सायकल की तरह पिताजी के और भी सामान बाहर होने लगे और एक दिन पिताजी..

पुरानी बाते सोच-सोच कर थकने के बाद आखिर नींद आ ही गयी...सुबह की गर्मी से आँख खुली तो बीती बातें फिर पहले की तरह हवा हो गयी थी..अंजली ने सारा सामन पैक कर लिया था अब मुझे भी यहाँ रुकने का मन नहीं था...चाय की चुस्कियाँ लेता वापस जाने के बारे में सोच रहा था तब मैंने संतु को घर का काम करते देखा, उसके साथ एक बच्चा उसके हर एक काम को देख उससे सवाल पूछता जा रहा था...मैंने पहले तो ज्यादा ध्यान नहीं दिया फिर मुझे याद आया ये उससे पुत्र का पुत्र होगा...अब मुझे उसके बारे में रूचि हुई तो पास जाकर बात सुनने की कोशिश करने लगा..

बच्चा हर बात पर क्यों क्यों करके सवाल पूछता जाता है...और संतु हर उटपटांग बात का जवाब देता जाता है...एक और कटु सत्य हिला कर रख देता है, जब बच्चा बार-बार अपने पिताजी से सवाल पर सवाल करता जाता है, पिता बिना झल्लाए हर सवाल को पहले से अधिक शांति से उत्तर दे कर समझाने की कोशिश करता है..लेकिन वही बच्चा बड़ा हो जाता और पिता कोई नयी चीजों को समझ नहीं पाता तो बेटा झाल्लाकर कर उसे जवाब देता है आप रहने दीजिए आपके समझ में नहीं आएगा..आज संतु के साथ उस बच्चे को खेलता देख पहली बार पिताजी और प्रभु को मन में साथ रखकर सोचने लगा और दोनों को बदकिस्मत जानकर अपने किये पर बहुत पछतावा हुआ |

आज जिस अपनी सोच,बुद्धि,सोच पर गर्व किया करता था कितना उथला लग रहा था, अपने घमण्ड में ही चूर रहा कभी पिताजी को खुश नहीं रख पाया, पिताजी के मुस्कान से ही मेरी मुस्कान थी, पर ना जाने मैं कहां इस भौतिकता में खो गया और वो हाड मांस का महामानव जिसने मेरी खुशियों की ही हमेशा चाह की, मेरी नजरो में अदृश्य हो गया था, जाने क्यों युवा की ऐसी फितरत होती है उसे नित नयी चीजे अच्छी लगती है और क्यों पुराने का हमेशा तिरस्कार करता है, मैंने अपनी सोच में ही पिताजी को अपना दुश्मन बना लिया था, ना जाने वो उस मानव के दिल पर क्या बीतती होगी जब उसी का अंश उसका इतना अपमान करता होगा..

मैं आँगन के बीच पर आंसू और पसीने से लथपथ अपने चारो ओर बदहवास देखता जा रहा था, और सारा अतीत किसी चलचित्र की भांति मेरे आगे पीछे दौड रहा था, कही पिताजी का पसीने से भीगा चेहरा नजर आता, कही अपने पुत्र को खाता देख भूख के बावजूद संतुष्टी का भाव, कही भविष्य की चिंता करती सलवटे भरे चेहरे नजर आते तो कही मेरे कहानी पढ़ कर सुनाने पर सब कुछ मिल जाने वाला भाव लिए चेहरे नजर आते, और मेरे पास इन सब लम्हों की यादो को बटोर लेने के अलावा कोई चारा नहीं था |

सुख या दुःख के पल गुजर जाने के बाद किसी के हाथ नहीं आते बस यादें रह जाती है, रह जाता है किसी के द्वारा सिखाया गया जीवन दर्शन किसी के द्वारा जगाया गया आत्म बल जो आजीवन साथ रहता है |

  हम जैसे भी थे हमारे माता-पिता ने हमें स्वीकार किया,
हमारे माता-पिता जैसे भी है, क्या हमने उनको स्वीकार किया ??