रविवार, जनवरी 15, 2012

एक कप काफ़ी


जब तुम साथ थे तब वक्त साथ नही था,
अब वक्त साथ है तो तुम साथ नहीं हो,
तुम पर एक कप काफ़ी अभी भी उधार है |

तुम क्यों नहीं आते


रूठे उस वक्त तुम मुझसे कुछ इस तरह,
उस वक्त मुझसे रोका नहीं गया,
सोचा साहिल पर कभी तो पलट कर आएगी,
सुना है बहुत खुश है वह अपने नए शहर में,
दोष कुछ वक्त का भी था जरा थमा नहीं मेरे लिए,
सब कहते है वक्त पलट कर नहीं आता,पर तुम क्यों नहीं आते |

रविवार, जनवरी 01, 2012

रेतघड़ी



दिन बुरे नहीं थे जब पानी और सूरज घरो की छ्प्परें लाँघ जाते थे,
जब हवा भी बिन पूछे दरवाजा धेलकर अंदर आ जाती थी,
जब दिन की शुरूवात पंछियों के चहचाहट और रातें जुगनुओं की रौशनी से भरी होती थी,
जब सारा दिन यूँ ही दोस्तों के साथ और रातें हसीं ख्वाबो में काट दिया जाता था,
जब बारिश में खिड़कीयों के कांच पर उंगली से सन्देशे लिखे जाते थे,
जब हवाई जहाज की आवाज सुन छतों की ओर बेलगाम भागा करते थे,
जब कंचो,मीठी गोलियों, पतंगों का कुशल व्यापारी की तरह सौदा किया जाता था,
जब कब कहाँ आँख लग जाए पता नहीं चलता था,

दिन बुरे नहीं थे जब पानी और सूरज घरो की छ्प्परें लाँघ जाते थे,
काश कोई उल्टा सकता वक्त को रेतघड़ी की तरह |

सोमवार, दिसंबर 19, 2011

ठूंठ


अकेला खड़ा है वह,
दूर से ही दिखता है, 
एक ठूंठ की तरह, 
आसमान को ताकता,
एक ठूंठ की तरह,
कभी आबाद था,
लोग कहते हैं,
कभी मुस्कुराया करता था,

लोग कहते हैं,
प्यार के सपने देखे थे |

ख़ामोशी



आज सुबह रुमाल देख कर फिर तुम्हारी याद हो आई,
भुला करते थे कभी रुमाल जानबूचकर,
पर अब याद आने से डरते हैं,
वो दिन था हम सुन कर भी अनसुना कर गए थे,
लगा था पलटकर जवाब देंगे कभी,
सोचा नहीं था कभी दीदार को तरसेंगे,
ऐसा नहीं था, की चाहते नहीं थे हम भी,
पर ज़माने की खातिर खामोश रह गए जुबाँ से |