मंगलवार, अप्रैल 24, 2012

ये कैसी क्यों है..



गयी रात हवाएँ बड़ी जोर पर थी,
किताबों के पन्ने फडफडाने लगे,
मेरे यार की आदतें भी इन पन्नों के जैसी है,
कभी हवाओं से इधर कभी उधर ...

रविवार, अप्रैल 22, 2012

चुभन..















सुबह-सुबह आँख खुली तो देखा,
रात की बारिश सूखे पत्ते हरे कर गयी है,
छत पर देखा तो वो गीले बाल छांट रही थी,
और मेरी ओर देख कर मुस्कुरा रही थी,
आज की ही बात थी शायद,

ख्वाब याद कहाँ रहते हैं |

शुक्रवार, अप्रैल 06, 2012

तुम हो पास मेरे


















उफ़ ये रात का तूफान ,
किताबो से दबे सूखे पुराने पत्ते उडाकर ले गया ,
जाने आज रात और क्या-क्या निकाल बाहर करेगा |


शनिवार, फ़रवरी 25, 2012

मरीचिका

 कुछ दूर और फिर तुम,
कुछ कदम और फिर तुम,
उफ़ ये नापाक मरीचिका,
जैसे सब कुछ लिखा हो,
चन्द कुछ घिसी-पीटी  लकीरों में,
तो क्यों न खुरच कर बदल दूँ इन्हें |

रविवार, जनवरी 15, 2012

एक कप काफ़ी


जब तुम साथ थे तब वक्त साथ नही था,
अब वक्त साथ है तो तुम साथ नहीं हो,
तुम पर एक कप काफ़ी अभी भी उधार है |