गुरुवार, अगस्त 23, 2012

..मुत्थु...


             मैं यहाँ ३० सालों से काम कर रहा हूँ, जानता हूँ यहाँ सब साहब लोग सिर्फ अपना जेब भरने का जुगाड़ करते है | मैं उसकी बातें मन से नहीं सुन रहा था,बीच-बीच में हाँ हूँ या सही है जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर देता जिससे उसे लगे की मैं उसकी बातें सुन रहा हूँ |
               मुत्थु, नारायण का असली नाम नहीं था, बहुत कम लोग उसका असली नाम जानते होंगे, मुझे उसी ने बताया था जब वह पहली बार मुझे मिला था, मध्यम कद, भारी भरकम शरीर और काला रंग उसके नाम को सही जंचता था, एक पैर को लगभग घसीटते हुए धीरे-धीरे चलता था, जिससे उसकी एक पैर की चप्पल का निचला सिरा काफी घिस चुका था, वह अपनी उम्र ५७ बताता पर शरीर से ६७ की उम्र से कम का नहीं लगता, दफ्तर में था तो वह चपरासी था पर उससे बमुश्किल दिन भर में १-२ काम लिया जाता और सारा दिन वह अपनी स्टूल पर बैठे-बैठे काट देता |
            वह मेरे टेबल पर एक हाथ से कब्ज़ा जमाये बोले जा रहा था, फिर अचानक वह थोडा और पास आ गया और आवाज़ धीमी करके बोलने लगा, जैसे वह ख़ुफ़िया एजेंट है और कई जासूस उसकी बातें सुनने कान गडाए हैं, ये जो बड़े साहब है न उनके घर पर जो सोफा रखा है न वह दफ्तर का ही है, और कितने ही कुर्सी अपने घर पर ले जा चुके हैं, मैंने दिखावे के लिए विस्मय से कहा ”ऐसा क्या”, पर वह मेरे भाव समझ नहीं पाया और उल्टा उत्साहित हो गया और कभी आवाज़ धीमी तो कभी सामान्य आवाज़ में इधर-उधर की बातें बताता रहा और मैं बिना नजरें उठाये हाँ, हूँ करता रहा |
                  वैसे तो मैं दिन भर अपने काम में व्यस्त रहता पर मुझे अक्सर दफ्तर आने और जाने के वक़्त पकड़ ही लेता था, इसके अलावा अगर दिन में मैं कभी सुस्ताता दीखता तो वह तुरंत हाजिर हो जाता, उसकी कही बातों से लगता जैसे वह न्यूज़ चैनल से बातें रट कर आया है, वह चाहता की मैं भी अपनी कुछ राय दूँ ताकि बातचीत और रोचक बनाया जा सके, पर मैं उसकी बातों पर हाँ-हूँ करता रहता जिससे उसे लगे मैं उसकी बातों को सुनने का इच्छुक नहीं हूँ और वह जल्दी से दफा हो सके, कई बार उसके मुद्दे व तर्क इतने बकवास और स्तरहीन लगते की मैं सिर्फ तिलमिला कर रह जाता, पर कुछ बोलते नहीं बनता था,इसका कारण एक तो उसकी उम्र थी और दूसरी ये की मैं अक्सर कठोर शब्द बोलने से बचता था |
         आजकल कुछ दिनों से वह अपना बैठने का स्टूल ऐसी जगह सेट कर लिया था जहा से वह आसानी से मुझको देख सके जैसे वह किसी भी समय मुझे खाली छोड़ना नहीं चाहता था, दफ्तर ज्वाइन किये अब मुझे एक माह हो चुके थे, मैं काम और मुत्थु की बकवास बातें सुन कर पक चूका था, बीच-बीच में रिलेक्स होने के लिए दफ्तर से बाहर निकल जाता था जहाँ एक टी-स्टाल था, कुछ दिनों तक मुत्थु की आँखों में धुल झोकता रहा, सुबह दफ्तर देर से आना और देर तक काम करने के  कारण मुत्थु को अब मुझसे मिलने का समय नहीं मिलता था, अब लगा मुत्थु से अब छुटकारा मिल गया है, पर ये इतना आसन नहीं था, एक दिन देखा तो मुत्थु टी स्टाल पर पहले से ही मौजूद था, अब तो जैसे ही मैं टी स्टाल के लिए निकलता तो मुत्थु भी मेरे पीछे-पीछे पहुच जाता, एक-दो बार तो मैंने मुत्थु से चाय के लिए पूछ कर पिलाया पर अगली बार चाय स्टाल का मालिक खुद ही दो चाय भेजने लगा, चाय आर्डर करने से लेकर वापस दफ्तर पहुचने तक का समय अब मुझे भयावह लगने लगा, मुत्थु से पीछा न छूटता देख मैंने चाय स्टाल पर जाना छोड़ दिया, पर अब हालात और बिगड़ने लगे अब मुत्थु खुद दो चाय लेकर आने लगा, एक दो दिन तो मैंने उसे चाय वाले को देने के लिए पैसे दिए पर अगले दिन से मैंने उसे पैसे देना बंद कर दिए, पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ना था, चाय वाले ने ७ दिन का बिल ऊपर से थमा दिया |
        आज बारिश की वजह से दफ्तर में काम ढीला ही था, मैं भी जल्दी से काम निपटा कर घर लौटने के फिराक में था की सामने से मुत्थु आता दिखा, दफ्तर में सिर्फ उसके चलने से होने वाले आवाज़ से मैं समझ जाता की अब मुत्थु आने वाला है, दफ्तर में अन्य लोग इतने व्यस्त रहते की उनके चलने से ऐसा लगता जैसे सिर्फ परछाई इधर से उधर हुई है, और मुत्थु के आने से ऐसा लगता जैसे काली घटा धीरे-धीरे आसमान पर छा रही है, और रौशनी कम होती जा रही है, ऐसा इसलिए भी लगता क्योंकि जैसे-जैसे वह पास आता जाता धीरे-धीरे दरवाजे से आने वाली रौशनी भी उसी अनुपात में कम होती जाती, उसके लंगड़ा कर धीरे-धीरे चलने से ऐसा भी लगता जैसे वह सोचते हुए आ रहा क्या-क्या उसे कहना है |
 आते ही उसने पहले महंगाई के मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथ लिया, फिर क्रिकेट खिलाडियों के आचरण पर बातें करने लगा, मैं हमेशा की तरह सर गडाए अपने फाइलों में व्यस्त था, तभी दरवाजे पर आहट सुनकर मुत्थु और मैं दरवाजे की ओर देखने लगे, कुरिअर वाला लड़का था, उसने मुझे एक लिफाफा दिया और एक किताब दिया जिसमे मैं सिग्नेचर करने के लिए अपना नाम खोजने लगा, कुरिअर वाला लड़का मुत्थु की ओर देखने लगा, मुत्थु अभी चुप था और कुरिअर वाले के जाने का इंतजार कर रहा था, तभी कुरिअर वाले ने मजाकिया लहजे में मुत्थु से कहा “तेरी बीबी किसके साथ भाग गयी” मुत्थु बिना कुछ बोले हड़बड़ी में बाहर निकल गया, कुरिअर वाले ने मेरे चेहरे के मनोभाव पढ़ लिए थे, और बोलने लगा, और बोला साहब इसकी बात मत सुना करो पागल है, जब भी यह अपना भाषण शुरू करे सिर्फ इससे यह पूछ लिया करो “तेरी बीवी किसके साथ भाग गयी” तुरन्त रफूचक्कर हो जायेगा |मुझे कुरिअर वाले की बातें अविश्वसनीय लगी, मैं उसके जाने के बाद अपनी फाइल समेटने लगा और अपने केबिन के लाइट पंखे बंद कर निकल ही रहा था की मुत्थु ने मुझे फिर पकड़ लिया, मैं उससे पीछा छुड़ाने जल्दी-जल्दी गेट की ओर बढ़ने लगा पर मुत्थु भी कहा हार मानने वाला था मेरी बराबरी करने वह लगबग दौड़े जा रहा था, अब मै दफ्तर के बाहर निकल चुका था, मुत्थु अब भी मेरे पीछे चला आ रहा था और उसका न्यूज़ चैनल अभी भी चालू था, मैं उससे पीछा छुड़ाने के लिए कुछ भी करने को तैयार था, आखिर जो कुरिअर वाले ने मुझे कहने को कहा था मैंने कह दिया, उसके चलने के आवाज़ से मुझे पता चल गया की वह मुझसे पीछे छुट गया |
           दुसरे दिन मैं कल वाली घटना भूल चूका था, दोपहर तक तो कुछ पता नहीं चला, दोपहर तक तो मुझे पता नहीं चला, पर जब मुत्थु के स्टूल वाले जगह पर नजर गयी तब पता चला उसके स्टूल का जगह अब बदल गया है अब वह मेरे चेम्बर से नजर नहीं आता था, आज शाम को भी वह तंग करने नहीं आया तब विश्वास हुआ की एक सिरदर्द दूर हुआ |
             २-३ दिन बाद फिर कुरिअर वाला लड़का कुरिअर देने आया और ना चाहते हुए भी मैंने उससे मुत्थु के बारे में पूछ लिया, कुरिअर वाले लड़के ने मजाकिया लहजे में हंस-हंस कर बोलना शुरू किया, साहब आप नए हो आपको मालूम नहीं है पहले यह बहुत शराब पीता था ,सारी तनख्वाह सिर्फ पीने में उड़ा देता था, फिर एक दिन इसकी बीवी अपने बच्चों को लेकर इसको छोड़ कर कही चली गयी, इसने महीनो तक उसको ढूंढा पर वह कभी वापस नहीं आई, इसने अपना मानसिक संतुलन खो दिया और दिन रात नशे में रहता और पी कर अपने कमरे में ही पड़ा रहता, फिर एक दिन पता नहीं अचानक क्या हुआ हुआ इसको उसने शराब पीनी छोड़ दी और फिर से दफ्तर आना शुरू कर दिया, और ज्यादा बात करना शुरू कर दिया, अब करीब करीब १५ साल से ये ऐसा ही है, इसको भागने का सिर्फ एक ही तरीका है इससे पूछ लो “ तेरी बीवी किसके साथ भाग गयी ” वह तुरंत कट लेगा |
         मुत्थु के बारे में सुना तो कानों पर विश्वास नहीं हुआ, घर आने पर भी मैं उसके बारे में सोचता रहा, मुझे शहर में अपना पहला दिन याद आ गया, नयी नौकरी नया शहर, और सबसे पहले मुत्थु से मिला उसका मुझे दफ्तर तक ले कर जाना याद आया, उसकी होटल वाले को दी हिदयात याद आयी साहब को ऐसा खाना खिलाना वैसा खाना खिलाना |
         अगले दिन मुत्थु को स्टूल पर बैठा देख अपने पर शर्म आयी, उसका चेहरा वैसा ही था जैसे कुछ हुआ ही नहीं, बस वह मुझसे नजरे नहीं मिला रहा था और मै उससे, मैं अपनी कुर्सी पर बैठे फाइलों पर नजरें तो जरुर गडाया हुआ था पर सोच रहा था मेरा उस दिन ऐसा कहने के बाद उसने क्या किया होगा, हो सकता है वह बहुत दुखी हुआ हो और वो शराब दुकान गया हो और उसने शराब पी हो, मेरे सामने एक पागल व्यक्ति का चित्र आ गया जो लंगड़ा कर चलता है, बच्चे उसे चिढ़ा रहे हैं और वो लंगड़ा-लंगड़ा कर बच्चों को भागने की असफल कोशिश कर रहा है, आस पास के दूकान वाले सिर्फ एक बार नजर उठा कर दृश्य देख लेते है, अन्ततः वह दुखी होकर अपने घर की ओर वापस मुड जाता है, बच्चे उसे उसके घर के बाहर से ही आवाज़ लगा कर चिढाने की कोशिश करते हैं और वह बाहर के शोर को कम करने के लिए टीवी ऑन कर लेता है, बच्चे उसे ना चिढ़ता देख वापस अपने दुसरे खेलों में व्यस्त हो जाते है, उसका मन अकेलापन दूर करने के लिए संवाद चाहता पर कोई उसे सुनने को तैयार न होता, वह बड़ी समझदारी से दूसरों को अपने संवाद में उलझाने का प्रयत्न करता, पर अतिव्यस्त बुद्धिमान मनुष्य उसके बीवी के बारे में सवाल पूछते, उससे कोई जवाब देते ना बनता और वह चुप होकर अपनी अँधेरी खोली में छुप जाता |
       दफ्तर बंद होने का वक़्त हो चुका था एक-एक कर सभी बाहर निकल चुके थे मैंने भी अपने टेबल के सामान को लगभग बेहोशी की अवस्था में एक ओर समेटा और बाहर की ओर जाने लगा, मुत्थु लंगड़ाते हुए दफतर के अधखुले दरवाजे से अपने को गिरने से बचाने का प्रयास करता हुआ निकल रहा था, उसके दरवाजे से निकलते तक मै उसके पास पहुच चुका था, मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा, विस्मय और डर का भाव लिए उसने अपना सर घुमाया, तब मैंने कहा मुत्थु स्वामी चाय पीने चलोगे | 

अपने आस-पास देखते चलो क्या हो रहा है,जिंदगी जीना सीख जाओगे |     

..क्या-करूँ..    
           

मंगलवार, जून 19, 2012

उफ़ उनकी ये बेपरवाह नजरें..















ऐसा भी नहीं था की पहचान नहीं थी,
नजरें भी मिली थी, पर उन्होंने देखा ऐसे,
जैसे कोई किसी के दिए गुलदस्ते को एक बार देख, बस रख देता है,

फूलों के मुरझाने की भी वजहें होती हैं |

मंगलवार, जून 12, 2012

वही चार लोग..कहने वाले...


















जैसे वो गुजरे ज़माने की बातें थी,
किस्से कहानियो और किताबों की दुनिया,
वो बगीचों की शामे,
फिर वो खुली आँखों की नींद,
छतों पर बहाने बना कर टहलना,
बड़े-बड़े सपने देखना फिर थक के सो जाना,
दोष वक्त का नहीं,
दोष उनका है जिन पर,
निकम्मों को काम पर लगाने का ठेका है |

रविवार, मई 13, 2012

कुछ बातें तीसरे साल की..




कल रात हमारी फ़ोन पर अच्छी खासी बात हई, और कल रात उसने उससे बात नहीं की, वरना वो लोग सारी रात बात करते थे,आज मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है,वैसे तो हम हफ्ते में तीन चार दिन मिल ही लेते है पर आज न जाने ऐसा लग रहा है की आज पारुल ने उसे नहीं बुलाया होगा, वैसे मै और पराग बहुत अच्चे दोस्त है, मेरा नाम प से क्यों चालू नहीं हुआ,जब भी मै प से नाम वाले किसी लड़के से मिलता हूँ, तो मन ही मन पारुल के साथ उसे खड़ा कर के देखता हूँ, की उनकी जोड़ी कैसी लगेगी |

मेरी बदकिस्मती ये थी की मेरे स्कूल में स नाम से शुरू होने वाली कोई लड़की नहीं थी, यह बदकिस्मती कॉलेज में भी जारी रही, लड़की तो थी पर सुन्दर नहीं जितनी पारुल है, उतनी नहीं की जिसे सोच-सोच कर रात भर कविता लिखा जाये, उतनी नहीं की जिसका नाम लेकर हसीं सपनो में खोया जाये, उतनी नहीं जिसे सोच कर सुबह कड़ाके की ठण्ड में रजाई से निकलने का साहस कर सकूँ |

मै पारुल के कहे अनुसार स्टेशन पहुँच चूका था, अभी तक पराग नहीं आया है, तभी सामने से पारुल आते हुए दिखाई दी, और जैसे हमेशा होता है मेरे हाथ पैर जैसे बर्फ से जम गए, और हमेशा की तरह मुझे कुछ बोलने का मौका न देते हुए उसने बोलना शुरू किया, आज बहुत थक गयी हूँ, आज ये क्लास थी वो क्लास थी उसकी बातें मुझे याद नहीं, कुछ देर अपनी व्यथा सुना लेने के बाद उसने आखिर पूछा कैसे हो, मैंने औपचारिक रूप से जवाब देते हुए कहा अच्छा हूँ, इतना कहने की देरी थी फिर उसने अपनी कहानी शुरू कर दी जिसने उसे अकेले मिलने पर मजबूर कर दिया था |

वह बोली आजकल पराग का मोबाइल रात को व्यस्त बताता है और वो पहले की तरह बात भी नहीं करता,लगता है वो किसी और लड़की से बात करता है,उसने एक दिन बताया भी था की रेणु नाम की लड़की उसकी अच्छी दोस्त है |

उसका इतना कहना था और मेरी सारी खुशी काफूर हो गयी मैंने सोचा था उसने मुझे अकेले मिलने के लिए बुलाया है,मुझे अब अपने पर गुस्सा आने लगा मुझे पहले क्यों नहीं पुछ लिया की पराग क्यों नहीं आया है?

और इसके बाद उस मतलबी लड़की ने जो कहा मैं सुन नहीं पाया क्योंकि मेरे काम सुन्न हो गए थे,मुझे बस तेज आवाज से सुन्न करके ध्वनि सुनाई दे रही थी,मुझे उसके ट्रेन के आने की आवाज़ भी कम आने लगी,मेरे कान लाल हो गए मेरा सर घूम गया ,मैं क्या सोचकर इससे मिलने आया था ,और वो मेरा इस्तेमाल अपने प्यार परखने में कर रही थी ,ट्रेन में चढ़ने के बाद उसने मुझे बाय किया और कहा जल्दी फोन करना ,जैसे तैसे उसे विदा करके मैं अपने रूम के तरफ कदम बढ़ाया ,मैं गुस्से से तर-बतर इतना तो तय कर चूका था जो वो करने बोली नहीं करूँगा |

मैं स्टेशन से लेकर सीधे घर पहुचने तक होश में नहीं रहा, पता नहीं कैसे घर पंहुचा और मेरे कमरे में दो लोग बैठे हुए थे, मेरा रूममेट और पराग, मेरा मन पारुल के लिए घृणा से भर गया, क्या करूँ सोचते हुए अपने पलंग पर लेट गया |

तभी पराग मुझसे कहता है, यार मेरा पारुल से ब्रेकअप करवा दे यार, मैंने कारण जानना चाहा, उसने कहा असल में मुझे भी नहीं पता यार, मैं बाद में तुझे अच्छे से सब बताऊंगा, अभी मेरा दिमाग इस स्थिति में नहीं है की तुझे इतना सब दिमाग से खोद-खोद कर बताऊँ, बस मेरे लिए तू करना चाहे तो इतना कर सकता है की मेरा ब्रेकअप करवा दे यार, मेरे रूममेट ने भी इसका कारण उससे जानना चाहा पर वो अभी कुछ नही बता रहा था | उसका मेसेज आया हुआ था, जल्दी बता न मीनू, पूछा क्या?? कभी-कभी वह मुझे मीनू बोलती थी ,ये मौका आज बहुत दिन बाद आया था ,अब मैं छत में आ चुका था, पर अब सोचने की जरुरत क्या थी, तूरंत पारुल को मैंने कहा तुम्हारा शक सही निकला वो रेणु से मिलने गया था, इतना सुनना था की वो पराग को बुरा-भला कहने लगी, फिर बहुत सर खपाने के बाद उसने एक अच्छी बात कही अब हम उसकी बात कभी नहीं करेंगे, अब बस मैं और सिर्फ तुम रहेंगे, अब मैं उससे कभी बात नहीं करुँगी |

नीचे जाकर पराग को देखा तो लगा वो पारुल वाली बात भूल चूका था, उतना परेशान नहीं दिख रहा था जितना पहले दिख रहा था| मैंने उसको बता दिया की मैंने पारुल को बोल दिया है तू रेणु से मिलने गया था, मेरा इतना कहना था वह बिदक पड़ा, तू उसको ऐसा क्यों रेणु के बारे में बोल दिया, वो मेरे बारे में क्या सोच रही होगी यार, फिर काफी समझाने के बाद माना की अब वो कुछ भी सोचे उससे अब तेरे को को क्या करना है |

उसके जाने के बाद मैं अपने पलंग पर लेट गया आज काफी आराम लग रहा था,पारुल के बोले मीठे शब्द याद आ रहे थे “अब हम दोनों ही रहेंगे” ,मीठे-मीठे बाते सोचते कब नींद आ गयी, मेरी नींद खुली तब एहसास हुआ की मोबाइल रिंग हो रहा है |

पराग का कॉल था, उसने कहा मुझे अच्छा नहीं लग रहा है मैं घर जा रहा हूँ, मुझे आश्चर्य हुआ २ दिन पहले तो वो घर से आया है ,इतना जल्दी कैसे जा रहा है, मैं पारुल को बहुत प्यार करता हूँ उसे नहीं छोड सकता है क्या-करूँ बिलकुल अच्छा नहीं लगा रहा है, मैं पारुल को सब सच-सच बताने जा रहा हूँ, इसे पढ़ कर मेरे होश उड़ गए, तू कुछ मत कर यार, जो हो गया उसे जाने दे, मेरा दिल कहते हुए जोरो से धडकने लगा, तब वो बोला नहीं यार वो मेरा जल्दबाजी में लिया फ़ैसला था, मुझे ऐसा करके बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा है,मै उसको सब सच-सच बता दूँगा, फिर मैंने कहा नहीं यार ऐसा मत कर तू कुछ मत सोच हो सकता हो जो अभी तू सोच रहा है वो तेरा जल्दबाजी में लिए फ़ैसला हो| उसने कहा-ठीक है यार सोचता हू,अभी नहीं कहूँगा, मेरा मन इधर उधर भटक रहा है इसलिए मैं घर जा रहा हू कुछ समझ नहीं आ रहा है|

अब मेरा मन शांत हुआ और मैं पराग की ओर से निश्चिन्त हो गया की वो अब नहीं बताएगा उसे,अब मैं फिर मीठी-मीठी पारुल में खो गया,फिर ध्यान आया की कल कॉलेज में कैम्पस इंटरव्यू है ,पिछले बार मुझे सफलता नहीं मिली थी| बेहोशी में मीठे मीठे सपनो में मैंने रात का खाना खाया, मैं उस सुबह के बारे में सोचने लगा जब मैं नौकरी मिलने की खुशी अपने घर में दूँगा, पर उससे पहले पारुल को, और उससे कहूँगा जैसे वो पराग से रात भर बात करती है मुझसे भी करने को कहूँगा, और उससे कहूँगा की तू रोज मुझे सुबह फोन करके उठाया कर, उसके सुबह उठाने पर क्या दिन गुजरेगा, आज इतनी गर्मी में भी मुझे ठण्ड का एहसास हो रहा था, आज जो हो रहा था, आज से पहले कभी मैंने महसूस नहीं किया था, कल से मैं रोज स्टेशन जाऊंगा एक बार सुबह जब वो कॉलेज के लिए ट्रेन से पहुचेगी, और शाम को जब वो वापस घर जाने के लिए ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन आएगी, साथ बैठकर उसके कॉलेज के कैंटीन में टिफिन खायेंगे |

सुबह आँख खुली तो पारुल ही पारुल ख्यालो में आ रही थी,बिस्तर से निकलने का मन नहीं कर रहा था,नींद भी पूरी नहीं हुई थी,किसी तरह तैयार हो कर कॉलेज के लिए निकला ,दिल बहुत खुश था,अगर आज सब कुछ ठीक रहा तो आज का दिन मेरे लिए सब से बड़ा दिन होगा |

आज किस्मत बहुत ही अच्छी लग रही थी जल्दी ऑटो भी मिली और मै लगभग कॉलेज पहुँच ही गया था,तभी फोन में रिंग आना शुरू हुआ मैंने जल्दी से देखा तो पारुल का ही था मैंने सोचा बेस्ट ऑफ लक बोलने के लिए ही फोन किया होगा, उसने कहा पराग का फोन आया था अब सब ठीक हो गया है, मैंने कहा तुमने उससे बात क्यों की इस पर उसने कहा अरे उसने अपनी गलती मान ली है, अच्छा मै रखती हूँ शाम को बात करती हूँ, उसने फोन रख दिया मैंने देखा मोबाइल पर कुछ मेसेज भी आया है पराग का था उसने लिखा था सॉरी भाई पता नहीं मुझे क्या हो गया था पर अब सब ठीक है मैंने पारुल को मना लिया है और कह दिया की कल शाम को मैंने ही बोलने को कहा था रेनू वाली बात |

यह सब होते तक मै क्लास रूम तक पहूँच चूका था, मै जैसे अंदर गया पेपर्स भी बांटे जाने लगे, मै अभी तक पराग का मेसेज बार-बार पढ़ रहा था, समझ नहीं आ रहा था ऐसा कैसे हो गया, अब पारुल ना जाने क्या सोचेगी मेरे बारे में, और जैसे सब कुछ सपनो में चल रहा है ऐसा लग रहा था, एक्सामिनेर सबको मोबाइल बंद करने को कह रहे थे और सभी अपने अपने पेपर्स पर टूट पड़े थे, मै अभी तक मोबाइल हाथ में रखे उसे देखे जा रहा था, फिर पता नहीं मेरे मन में क्या आय मेरे हाथ अपने आप मोबाइल पर मेसेज टाइप करने लगे और पराग और पारुल दोनों को फॉरवर्ड कर दिया फिर मैंने अपना मोबाइल स्विच ऑफ किया और जैसे तैसे पेपर खत्म करके अपने रूम पहुच गया |

रूम पहुचते तक रिटन का रिजल्ट आ चूका था, मै अपना सामान पैक करके अपने घर निकल गया, बस भी जल्दी ही मिल गया, मोबाइल पर यार दोस्तों के फोन आने शुरू हो गये थे, सब मेरी असफलता और अपनी सफलता की कहानी कह रहे थे, कुछ देर बाद पराग के भी कॉल आने शुरू हो गए, मैंने कॉल नहीं लिया, १ से २ फिर ८-१० मिस कॉल के बाद पारुल के भी कॉल आने शुरु हो गए, कुछ मिस कॉल के बाद बस के इंजन के घरघराहट ही रह गयी, सारे रास्ते मै खुली आँखों से सोता रहा |

घर पहुँच कर मम्मी को देख कर अपने आप आँखों के किनारे कुछ गीलापन लगा, सभी कह रहे थे थे कोई बात नहीं और किसी कंपनी में सेलेक्ट हो जाओगे |
आज इस वाकये को ४ साल हो चुके हैं, आज भी मै पारुल को उसके जन्मदिन पर मेल करता हूँ, पराग आज भी अच्छा दोस्त है, पारुल और पराग की शादी हो चुकी है पर अलग-अलग |


              ऐसा भी होता है कभी-कभी यादें उतना दर्द नहीं देती, जब वो यादें नहीं थी |

मंगलवार, अप्रैल 24, 2012

ये कैसी क्यों है..



गयी रात हवाएँ बड़ी जोर पर थी,
किताबों के पन्ने फडफडाने लगे,
मेरे यार की आदतें भी इन पन्नों के जैसी है,
कभी हवाओं से इधर कभी उधर ...